Write an Essay on untouchability in Hindi- अस्पृश्यता पर निबंध लिखो

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Essay on untouchability in Hindi

भारत दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं तथा कई जातियों और धर्मों में विभाजित है। हम यह कह सकते हैं कि भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसे जाति व्यवस्था द्वारा नियंत्रित किया जाता है और हर संभव प्रयासों के बावजूद हम इस प्रणाली को हटाने में असक्षम नहीं। परंपरागत रूप से, भारतीय समाज को चार समूहों में विभाजित किया गया था ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र और हमारा ग्रामीण समाज, जो पूरी तरह से शिक्षित नहीं हैं, सबसे इससे सबसे अधिक प्रभावित हैं। जाति व्यवस्था के कारण, भारतीय समाज में अस्पृश्यता प्रचलित है। इसकी जड़ हमारी सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था में गहरायी तक फैली हुई है। अछूतों को चीजों को स्पर्श करने, शहर या गांवों के जल स्रोतों से पानी पीने की अनुमति नहीं थी, उन्हें मंदिरों में जाने की भी इजाजत नहीं थी, और ना ही किसी अन्य जाति के सदस्य से शादी करने की इजाजत थी।

शूद्र जाति के लोगो को अछूत माना जाता था, कई तथाकथित उच्च जातियां उन्हें अछूत मानती हैं। महात्मा गांधी ने अस्पृश्यता के खिलाफ अभियान शुरू किया और कहा कि “अस्पृश्यता जाति व्यवस्था की एक घृणित अभिव्यक्ति है और यह भगवान और मनुष्यों के खिलाफ एक अपराध है”। महात्मा गांधी ने अछूतों को हरिजन का नाम दिया, अर्थात् परमेश्वर के लोग। अस्पृश्यता की समस्या अन्य सभी सामाजिक बुराइयों में सबसे अधिक घृणितअपराध हैं क्योंकि यह लोगों को उनके जीने के अधिकार से वंचित करता है। हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या अधिक गंभीर है जहां शिक्षा के आभाव के कारण, छुआछूत की प्रथा सबसे अधिक प्रचलित हैं।

अस्पृश्यता हमारे समाज में प्राचीन काल से ही प्रचलित है अछूत कौन हैं? मनू स्मृती के अनुसार, ऐसे लोग जो सफाई, चमड़े का काम, स्वच्छता, मवेशियों और मृत शरीरों को हटाने आदि व्यवसायों में शामिल हैं, उन्हें अछूत के रूप में माना जाता है। लेकिन वे हमारे समाज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, कल्पना करें कि यदि वे इन व्यवसायों में नहीं हैं तो पृथ्वी कचरा और मृत शरीर का ढेर बन जाएगी। हमारी सरकार ने अस्पृश्यता के खिलाफ कई कानून बनाए हैं लेकिन जब तक हम अपनी सामूहिक जिम्मेदारी को समझ नहीं पाते हैं और इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए आगे नहीं आते हैं, तब तक सभी व्यर्थ हैं। हालांकि अस्पृश्यता की समस्या को शिक्षा के समान अवसर देकर जिससे वे बेहतर रोजगार प्राप्त कर सकें और अपनी आर्थिक स्थितियों में सुधार कर सकें कुछ हद तक काम किया जा सकता है पर इस समस्या को जड़ से ख़त्म करने के लिए हम सभी को दूसरों के साथ समान स्तर पर व्यवहार करना सीखना होगा। यह एक व्यक्ति का व्यक्तिगत द्रृष्टिकोण है कि वह कैसे किसी को जाति या पेशे के आधार पर न आंककर उसे उसके कौशल और प्रतिभा से पहचाने ।

हम सभी मनुष्य के रूप में जन्म लेते हैं और मानवता और उत्तरजीविता के बराबर अधिकार रखतें हैं। किसी भी जाति या समाज को किसी अन्य व्यक्ति को उसकी जाति और पेशे के आधार पर नीचा दिखाने का अधिकार नहीं है। आज लोगों को इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए और हर किसी से समान व्यवहार करना चाहिए तभी अस्पृश्यता की बुराई से हमारा समाज स्वतंत्र होगा। जाति और वर्ग केवल वृत्तचित्र हैं, इसके कारण कोई भी श्रेष्ठ या निम्नतर नहीं है।

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