Essay on My Neighbour in Hindi- मेरे पड़ोसी पर निबन्ध

Essay on My Neighbour in Hindi- मेरे पड़ोसी पर निबन्ध

हम एक भीड़ भरी गली में रहते हैं और हमारे आसपास के इलाके में कई घर हैं। हमारे पड़ोस में बहुत से लोग रहते है कोई शिक्षक है तो कोई किसी कार्यालय या बैंक में काम करता हैं। हमारे घर के बगल में एक किरयाने की दूकान है और उस दुकान के मालिक मंज़ूर अली भी हमारे पड़ोस में ही रहते हैं. उनकी दुकान पुरे मोहल्ले में किरयाने की एक ही दूकान है इसलिए वो हमेश व्यस्त ही दिखिए देते हैं और पड़ोस में एकमात्र मुस्लिम परिवार है। मंज़ूर अली मध्यम आयु वर्ग के छोटे कद के बहुत ही सुलझे हुए इंसान है जो सबकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहते है। उनका घर मोहल्ले का सबसे बड़ा घर है जो उन्हें विरासत में मिला था. उनके घर के सामने एक छोटा बगीचा और पीछे एक बड़ा सा किचन गार्डन है।

मंज़ूर अली का किचन गार्डन पड़ोस में सबसे अच्छा है। वह अपने गार्डन में बहुत सी सब्जियां उगाते है और केले के पेड़ भी हैं. सप्ताह में कम से कम एक बार आप मंजूर अली को अपने हाथ में एक बड़े बैग के साथ पड़ोस में चक्कर लगाते हुए देख सकते हैं। इसमें बच्चों के लिए फल और कभी-कभी ताजा सब्जियां भी होती हैं जो वो मोहल्ले के जरूरतमंद परिवारों मे बाँट देते हैं। मंज़ूर अली सभी के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान देखकर ही खुश हो जाते हैं । इसके लिए किसी का भी धन्यवाद देना उन्हें पसंद नहीं है। फल और सब्जियां केवल वही चीजें नहीं हैं जो मंजूर अली अपने पड़ोसियों को देते हैं। वह अन्य तरीकों से भी सबकी मदद करते हैं, जो कई बार हम सबको आश्चर्यचकित करता है। जब कोई पड़ोस में बीमार होता है, तो मंज़ूर अली डॉक्टर को बुलाते हैं और दवाइयाँ भी खरीद कर ले आते हैं। अगर कोई मुसीबत में है, तो वह हमेशा मदद के लिए आगे आ जाते हैं। और अगर किसी को कोई भी ज़रूरत है, तो वह मंज़ूर अली के पास ही जाता है क्यूँकि सभी जानते हैं की मुसीबत में कोई और सहायता करे या नहीं मंज़ूर भाई तो है ही.

एक दिन मेरे पिता ने उनसे पूछा कि वह पड़ोसियों के लिए यह सब क्यों करते है। उन्होंने उत्तर दिया कि, “भाई, एक ही ईश्वर है और हम सभी उसके बच्चे हैं। मैं किसी के लिए कुछ नहीं करता। यह वह खुदा है जो मेरे माध्यम से यह सब करता है। उसके लिए कोई मतभेद नहीं हैं- धर्मों के बीच, अमीर और गरीब के बीच, आपके और मेरे बीच। हम सब उसके बच्चे हैं”। हम अक्सर आश्चर्य करते हैं कि मंज़ूर अली के बिना पड़ोस क्या होगा। साथ ही साथ भगवान् का धन्यवाद भी करते है की उन्होंने हमें उनके जैसा पडोसी दिया जो एक परिवार के सदस्य की तरह सबकी देखभाल करता है.

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